मैं न बिना जग में फिरता
राह कौन दिखाये
तुझसे है करतार विधाता
मैं हूँ आस लगाये
ठोकर खाकर पाँव से मेरे
बहती खून की धारें
पाप और दुःख के बादल काले
सर पर है मंडलाये
चमक उठी यह दुनियाँ सारी
तेरी ज्योति सबसे न्यारी
पर मेरा मन अंधियारे में
तुझको आज बुलाये
तुझसे प्यासा क्या मांगे बस
जल की दो एक बूंदे
जो जीवन जल मेरे व्याकुल
मन की प्यास बुझाये
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